गर्भावस्था के दौरान हेपेटाइटिस ई वायरस Hepatitis E Virus का इंफ़ेक्शन मां और बच्चे दोनों को लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है। हेपेटाइटिस ई का इंफ़ेक्शन सामान्य लोगों में अपने आप ख़त्म हो जाता है, लेकिन गर्भावस्था के दौरान यह घातक साबित हो सकता है। इससे बचाव के लिए समय से डॉक्टरी देखभाल आवश्यक है।

हेपेटाइटिस ई वायरस के इंफ़ेक्शन के कारण गंभीर स्थित में पहुंची 19.11 फ़ीसदी महिलाओं और 42.61 फ़ीसदी शिशुओं की मौत हो जाती है। इस तथ्य का खुलासा जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ इंडिया वायरल हेपेटाइटिस इन प्रेगनेंसी – ए स्टडी ऑफ़ इंटस इफ़ेक्ट ऑन मेटर्नल एंड फ़ीटल आउटकम शीर्षक शोधपत्र में किया है। विशेषज्ञों ने वायरल हिपेटाइटिस की गंभीरता और जीवन के लिए रिस्क फ़ैक्टर जानने के लिए 68 हेपेटाइटिस ग्रस्त महिलाओं पर शोध किया। इसमें देखा गया कि पांच महिलाओं में हेपेटाइटिस बी, एक में हेपेटाइटिस सी और 53 यानी 77.9 फ़ीसदी में हेपेटाइटिस ई वायरस का इंफ़ेक्शन मिला। इन सभी महिलाओं में पीलिया की परेशानी थी, जिसके बाद परीक्षण किया गया। देखा गया कि अधिकतर महिलाओं में हिपैटिक इंसेफ़लोपैथी (दिमाग़ पर पीलिया का असर) और अधिक बिलीरूबिन स्तर था। सामान्य और हेपेटाइटिस ई वायरस से ग्रस्त जिन महिलाओं में आइएनआर (ब्लड थक्का) और बिलीरूबिन बढ़ा था उनमें से 19.11 फ़ीसदी की मौत हो गई।

हेपेटाइटिस ई का ख़तरा

हेपेटाइटिस ई इंफ़ेक्शन

प्रमुख बातें

  • आइएनआर और बिलीरूबिन का बढ़ा स्तर है ख़तरे की घंटी
  • हेपेटाइटिस ई वायरस बन सकता है 19.11 फ़ीसदी महिलाओं के लिए जानलेवा
  • पीलियाग्रस्त 77 .9 फ़ीसदी में मिला हेपेटाइटिस ई का इंफ़ेक्शन

गंभीर ख़तरे के निशान

    1. रक्तचाप कम हो जाना
    2. गुर्दे में असर आने से पेशाब बंद होना या पेशाब करने में दिक्कत होना
    3. दिमाग़ में सूजन आने से दौरे पड़ना, बेहोशी होना (इंसेफालोपथी)
    4. ख़ून जमने की शक्ति न होने से शरीर से रक्तस्नाव होना

साफ़ खाना और पानी से बचाव संभव

पीलिया ख़ुद में बीमारी नहीं है, बल्कि अन्य किसी रोग की ओर इशारा है। गर्भावस्था में वैसे भी काफ़ी सतर्कता बरती जाती है फिर भी किसी भी तरह के रोग या उसके लक्षणों को बिल्कुल हल्के में नहीं लेना चाहिए। आगे चल कर पीलिया ही हेपेटाइटिस का रूप ले लेता है जिसके कई रूप हैं। इसके प्रति जागरूकता से ही बचाव संभव है। हिपेटाइटिस ए और ई प्राय: दूषित जल, फलों के रस, दूषित खान-पान एवं अस्वच्छ पर्यावरण से होता है।

क्यों होता है पीलिया

रक्त में बिलीरूबीन की मात्र एक मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक होने पर पीलिया कहा जाता है। इसमें मरीज की आँखें, त्वचा एवं पेशाब का रंग पीला हो जाता है। पीलिया रोग नहीं, रोग का लक्षण है। रक्तकणिका से हिमोग्लोबिन टूटने पर बिलीरूबीन बनता है। लिवर द्वारा बिलीरूबीन को रक्त से साफ़ किया जाता है। लिवर में ख़राबी आने पर बिलीरूबीन शरीर में बढ़ जाता है और पीलिया का रूप धारण कर लेता है। इसके अतिरिक्त लिवर में बनने वाले प्रोटीन, जैसे की क्लॉटिंग फ़ैक्टर (ख़ून को जमाने वाले) की कमी आ जाती है। गर्भावस्था में लिवर की सूजन का मुख्य कारण वायरस द्वारा संक्रमण होता है।

पीलिया के प्रमुख लक्षण

  1. आँख, त्वचा, पेशाब का पीला होना
  2. भूख न लगना, उल्टी आना
  3. थकावट, कमज़ोरी महसूस होना
  4. पेट में दर्द होना
  5. पूरे शरीर में खुजलाहट होना

हेपेटाइटिस का गर्भावस्था में असर

  1. शुरुआती दिनों में गर्भपात का ख़तरा
  2. समय से पहले डिलिवरी का चांस
  3. डिलिवरी के बाद अधिक रक्तस्राव का डर

लक्षण प्रकट होते ही लें सलाह

संजय गांधी पीजीआइ के पेट रोग विशेषज्ञ प्रो.यूसी घोषाल एवं एमआरएच विभाग की प्रो.संगीता यादव कहती हैं कि लक्षण प्रकट होते ही विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए हम लोग मेंटेनेंस थेरेपी के ज़रिए प्रभाव को कम करने की कोशिश करते हैं।