वैज्ञानिक बढ़ती हुई फ़ूड एलर्जी के कारणों की पहचान करने के लिए प्रयासरत हैं और हर सम्भावित कारण की खोज कर रहे हैं। अनेक नये शोध बताते हैं कि फ़ूड एलर्जी को रोकने के लिए रेशेदार भोजन या हाइ-फ़ाइबर डायट (High-fiber diet) लेने की आवश्यकता है।

मेलबर्न, आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनीवर्सिटी के इम्यूनोलॉजिस्ट चार्ल्स मैके (Immunologist Charles Mackay) के अनुसार इस धारणा का आधार यह है कि आँत में बैक्टीरिया एंजाइम की सहायता से रेशेदार भोजन को पचाने के लिए आवश्यक है, और जब ये बैक्टीरिया फ़ाइबर को तोड़ते हैं तब ये ऐसे पदार्थ बनते हैं तो खाद्य पदार्थों से होने वाली एलर्जी को रोकने में सहायक होते हैं।

रेशेदार भोजन के साथ प्रयोग

शोधकर्ता बताते हैं कि अभी तक इस धारणा से जुड़े सभी प्रयोग चूहों पर ही किये गये हैं और आहार कारकों से इसकी पूरी व्याख्या सम्भव नहीं है कि क्यों एलर्जी दर में इतनी तेज़ी से बढ़ रही है। लेकिन यदि यही परिणाम मानव अध्ययन में दोहराये जाते, तो यह बात सामने आती कि आँत के अच्छे बैक्टीरिया किस प्रकार से पलते-बढ़ते हैं और सम्बंधित एलर्जी से कैसे लड़ते हैं?

रेशेदार भोजन

चिकित्सा रहस्य । Medical Mystery

एनजीओ, फ़ूड एलर्जी रिसर्च एंड ऐजुकेशन के अनुसार, अगर अमेरिका की बात करें तो 15 मिलियन अमेरिकंस को फूड एलर्जी है और 1997-2011 के बीच यह 50 प्रतिशत बढ़ी है। 90 प्रतिशत लोग, मूंगफली, पेड़ नट्स, गेहूं, सोया, अंडे, दूध, शंख और मछली, इनमें से किसी एक चीज़ से एलर्जिक हैं।

यह बात अभी तक साफ़ नहीं है कि क्यों ये खाद्य पदार्थ इतनी एलर्जी क्यों उत्पन्न करते हैं। यूनीवर्सिटी ऑफ़ शिकागो के फूड एलर्जी शोधकर्ता कैथरिन नेग्लर (Food allergy researcher Cathryn Nagler) के अनुसार इसका सम्भावित उत्तर है कि ये आहार हमारी आँतों में ठीक प्रकार से न पच रहे हों और इसके अनपचे यौगिक ख़ून में जाकर मिल जाते हों, जहाँ एंटीबॉडीज़ या इम्यून सेल इसके प्रति अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं।

प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया । Immune Response

मैके और नेग्लर मानते हैं कि आधुनिक पाश्चात्य फ़ूड एलर्जी के कारण हो सकते हैं। न पच सकने वाले रेशेदार भोजन को पचाने के लिए इन बैक्टीरिया की आवश्यकता होती है। आधुनिक आहार में चीनी, वसा और कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा हमारी आँत में अलग-अलग प्रकार के बैक्टीरिया बढ़ाती हैं, जो कि मानव के पैतृक आहार में नहीं थे।
इन अतिरिक्त बैक्टीरिया का हमारी आँतों में होना अच्छा संकेत नहीं है।

परिणाम स्वरूप, फ़ाइबर क्लोस्ट्रिडिया (Clostridia) नामक बैक्टीरिया की वृद्धि में सहायक होता है। ये फ़ाइबर को तोड़कर लघु-श्रृंखला फैटी एसिड (Short-chain fatty acids) बनाते हैं। 2011 में नेचर पत्रिका के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार रेशेदार भोजन की ये लघु श्रृंखला फैटी एसिड हमारी आँतों को अनपचे पदार्थों को हमारे ख़ून तक पहुँचने नहीं देते हैं।

अगस्त 2014 में नेग्लर और सहयोगियों ने चूहे पर किये प्रयोग में क्लोस्ट्रिडिया को आँतों में स्थापित करके मूँगफली की एलर्जी को रोकने में सफलता प्राप्त की।

अन्य वातावरणीय कारक भी लो-फ़ाइबर आहार के साथ सहयोग करके एलर्जी को बढ़ावा देते हैं। कृषि में प्रयोग किए जाने वाले एंटीबायोटिक (Antibiotics) और शिशुओं के कान के इंफ़ेक्शन के इलाज में प्रयोग होने वाले एंटीबायोटिक, इस बैक्टीरिया को मार देते हैं। इस प्रकार लो-फ़ाइबर डायट (Low-fiber diet) और ऐसे एंटीबायोटिक का गठजोड़ दोहरा नुक़सान करता है, जिससे लोगों में एलर्जी की सम्भावना अधिक हो जाती है।

नये निष्कर्ष हमें एलर्जी से लड़ने और उसने बचाव के लिए रास्ता बताते हैं। नेग्लर के अनुसार, एलर्जी के इलाज के लिए प्रोबायोटिक्स (Probiotics) के प्रयोग करके क्लोस्ट्रिडिया को फिर से आँतों में बसाया जा सकता है। जिन बच्चों को मूँगफली से एलर्जी थी उन्हें जब प्रोबायोटिक दिये गये तो वे बिना एलर्जिक हुए मूँगफली खा सके और मूँगफली के प्रति यह बचाव इलाज के बाद भी बना रहा।

प्रारंभिक चरण । Early Stages

डॉ राबर्ट वुड (Dr Robert Wood) के अनुसार फ़ूड एलर्जी के लिए बहुत से कारक उत्तरदायी हैं। महामारी विज्ञान के अध्ययन से साबित होता है कि पालतू जानवरों की देखभाल करने और हाथ से जूठे बर्तन धोने से भी एलर्जी जा ख़तरा रहता है।

एलर्जी के सम्बंध में केवल 15 या 20 सिद्धांत ही कारणों की कुछ हद तक व्याख्या करने में सफल है। इसलिए विशेषज्ञ का कहना है कि आरम्भिक चरण में सामने आने वाले तथ्यों से कोई अनुशंसा करने आवश्यकता नहीं है। बरसों से डॉक्टर सलाह देते हैं 3 साल से कम उम्र के बच्चों को मूँगफली या अन्य एलर्जी पैदा करने वाले भोज्य पदार्थ नहीं देने चाहिए।
जबकि हाल के अध्ययन साबित करते हैं कि बच्चों को शुरुआत से मूँगफली देते रहने से मूँगफली की एलर्जी से बचे रहने में बहुत हद तक सफलता मिलती है।

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