जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ मौसम को ही क्षति पचा रहा है, ऐसा नहीं है। पर्यावरण भी इससे अछूता नहीं है। पर्यावरण में हुए परिवर्तन के चलते हम कई आहार विशेष और पेय भी खो रहे हैं। यहां हम कुछ ऐसे ही आहार विशेष पर चर्चा करेंगे। दुनिया की आबादी में करीब 1.7 अरब लोग आज भी कृषि पर निर्भर हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन की कोई भी सार्थक बातचीत में कृषि को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान पर नियंत्रण के बड़े-बड़े दावे भी किए जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से किन चीज़ों आप नहीं खा पायेंगे

जलवायु परिवर्तन का खानपान पर प्रभाव

मैपल सिरप

नमी युक्त ठंड और सूखी गर्मी के चलते शुगर मैपल पर भारी असर पड़ रहा है। तापमान में हुए बढ़ोत्तरी के चलते मैपल या चिनार के पेड़ प्राकृतिक प्रक्रिया को सही ढंग से अंजाम नहीं दे पाते। परिणामस्वरूप उनका उत्पादन कम होने लगता है। विशेषज्ञों की मानें तो तापमान मौजूदा समय अनुकूल बदलता रहा तो मैपल का बाज़ार जैसे पेनसिलवेनिया जैसे क्षेत्रों से खिसकने की भय बढ़ सकता है।

चॉकलेट

इंटरनैटशनल सेंटर फार ट्रापिकल एग्रीकल्चर द्वारा 2011 में किये गए अध्ययन से यह बात सामने आयी थी कि अगले कुछ दशकों में कोको बीन्स के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। परिणामस्वरूप बाज़ार में चॉकलेट दिखने कम हो सकते हैं। असल में चॉकलेट कोको बीन्स से ही बनते हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के चलते कोको बीन्स का उत्पादन में कमी आयी तो निश्चित रूप से चॉकलेट का टेस्ट स्वप्न बनकर रह जाएगा।

सीफ़ूड

जलवायु में हो रहे परिवर्तन का असर समुद्रों के बढ़ते स्तर में भी देखा जा सकता है। दरअसल जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। नतीजा समुद्र तेज़ाबी होता जा रहा है। यह न सिर्फ़ इंसानों के लिए ख़तरे की बात है बल्कि समुद्र में रह रहे तमाम जीव के लिए जानलेवा है। मसलन समुद्र में रह रहे जीव मसलन आयस्टर आदि कम पैदा होंगे जिससे समुद्री दुनिया प्रभावित होगी।

मक्का

पानी की कमी और बढ़ते तापमान के चलते मक्के की खेती में कमी आ रही है। इससे भी बुरी ख़बर यह है कि तापमान में जरा भी वृद्धि से मक्के का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि तापमान मौजूदा अनुपात में बढ़ता रहा तो इससे मक्के का उत्पादन कम होगा। मक्के की कमी न सिर्फ़ खाने में दिखेगी बल्कि बाज़ार को भी पूरी तरह हिलाकर रख सकता है। इन सबके इतर यह भी सच है कि मक्के की दिन पर दिन कमी हमें इसके स्वाद से भी वंचित कर सकती है।

मूँगफली

मूँगफली के उत्पादन में कमी आ रही है जिससे इनकी क़ीमत में उछाल आ सकता है। दरअसल मूँगफली के उत्पादन को सही अनुपात में बरसात और सूरज की रोशनी की आवश्यकता होती है। लेकिन बदलते तापमान के चलते मूँगफली को अब यह सब नहीं मिल पाता। नतीजनत मूँगफली के पैदावर, खपत से ज़्यादा है जो इसकी क़ीमत को बढ़ाने के लिए काफ़ी है।