हमारे सौरमंडल में बारिश, नदियाँ और समुद्र सिर्फ़ पृथ्वी और शनि ग्रह के उपग्रह टाइटन (Saturn’s Moon Titan) पर ही देखे गये हैं। दोनों पर मोटा वायुमंडल, पहाड़ी ज़मीन, टेक्टॉनिक्स प्लेट्स होने के साथ ही पोलर विंड (ध्रुवीय वायु या हवाएँ) भी मौजूद हैं। यह ध्रुवीय हवाएँ उसके वायुमंडल से गैसों को अंतरिक्ष में बाहर धकेलती रहती हैं।

टाइटन पर ध्रुवीय हवाएँ

पृथ्वी के बाद शनि ग्रह का सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन ही है जहाँ ध्रुवीय हवाएँ हैं। नासा का मानवनिर्मित उपग्रह कैसीनी (Cassini Orbiter) सन 2004 से शनि ग्रह की छानबीन में लगा हुआ है। इसने ही इन ध्रुवीय हवाएँ के बहने की जानकारी सुनिश्चित की है। उसने यह जानकारी प्लाज़्मा स्पेक्ट्रोमीटर (Plasma Spectrometer) के द्वारा पता की है।

टाइटन पर ध्रुवीय हवाएँ
Image Courtesy: NASA/JPL/Space Science Institute, Processed by Kevin M. Gill

टाइटन के वायुमंडल मुख्य रूप से नाइट्रोज़न और मीथेन (Nitrogen and Methane) का बना है और यह वायुमंडल पृथ्वी के अपेक्षा 50 प्रतिशत अधिक दबाव डालता है। कैसीनी द्वारा पता की गयी जानकारी के अनुसार टाइटन का वायुमंडल प्रतिदिन लगभग 7 टन हाइड्रोकार्बन और नाइट्राइल्स (Hydrocarbon and Nitriles) निकाल रहा है। नये किये जाने वाले शोध यह बात बताते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है।

यह सबूत 24.1 इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा वाले इलेक्ट्रान के रूप में मिले हैं, शोधकर्ता बताते हैं ऐसा कणों की प्रकाश के साथ प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होता है।

हालाँकि टाइटन पृथ्वी के अपेक्षा सूर्य से दस गुना अधिक दूरी पर है किंतु उसके वायुमंडल में प्रकाश पहुँचता है। जब प्रकाश टाइटन के आइनॉस्फ़ियर में अणुओं से भिड़ता है, तो हाइड्रोकार्बन और नाइट्राइल अणुओं के ऋणावेशित इलेक्ट्रान निकलने लगते हैं और धनावेशित कण को पीछे छोड़ देते हैं।

नये इलेक्ट्रान शनि ग्रह के चुम्बकीय क्षेत्र की ओर झुकते चले जाते हैं और एक इलेक्ट्रिक क्षेत्र का निर्माण करते हैं। यह इलेक्ट्रिक क्षेत्र धनावेशित कणों को भी वायुमंडल से बाहर खींच लेता है।

पृथ्वी पर इसी प्रकार का प्रभाव वायुमंडल में कणों को आवेशित करता है और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में झुका देता है और कण ध्रुवों की ओर चले जाते हैं। अभी तक हमारे सौरमण्डल में टाइटन ही है जो इस प्रकार से पृथ्वी पर होने वाली घटना में एक समान है। शोधकर्ता सुझाते हैं कि मंगल और शुक्र ग्रह पर भी ऐसा होने की पूरी-पूरी सम्भावना है।

यह शोध जिओफ़िज़िकल रिसर्च लेटर्स नाम के जनरल में 18 जून को प्रकाशित हुआ है।